पहला जौहर, जो इतिहास बना
पहला जौहर , जो इतिहास बना
आग का जलता हुआ गोला सनसनाते हुआ आया और हाथी से जा टकराया । गोले का टकराना था कि हाथी हड़बड़ा गया और बिगड़ कर रणक्षेत्र में अपने ही सैनिकों को कुचलते हुए भाग निकला। सैनिकों ने देखा कि हाथी पर सवार उनका राजा मैदान छोड़कर भाग रहा है,तो वे भी भाग खड़े हुए।और इस तरह जीत के निकट पहुंची बाज़ी हार गया सिंध का राजा दाहिर। रणक्षेत्र में उसके सामने था मुहम्मद बिन कासिम।मुहम्मद बिन कासिम यानी ईरान के खलीफा का सिपहसालार।
भारत पर,उसके सीमांत भाग सिंध पर अरब देश के किसी मुसलमान शासक का यह पहला हमला था,जिसने हिन्दू और मुसलमानों के बीच लड़ाई और फिर एक के बाद एक भारत पर हुए इस्लामी हमलों की नींव डाली।लेकिन हिंदुओ पर मुसलमानों का यह पहला हमला,पंडित सुंदरलाल के अनुसार,इस्लामिक जेहाद के तहत नहीं,बल्कि राजनीतिक कारण से था।आग का जलता हुआ गोला सनसनाते हुआ आया और हाथी से जा टकराया । गोले का टकराना था कि हाथी हड़बड़ा गया और बिगड़ कर रणक्षेत्र में अपने ही सैनिकों को कुचलते हुए भाग निकला। सैनिकों ने देखा कि हाथी पर सवार उनका राजा मैदान छोड़कर भाग रहा है,तो वे भी भाग खड़े हुए।और इस तरह जीत के निकट पहुंची बाज़ी हार गया सिंध का राजा दाहिर। रणक्षेत्र में उसके सामने था मुहम्मद बिन कासिम।मुहम्मद बिन कासिम यानी ईरान के खलीफा का सिपहसालार।
अरब,अफ्रीका व यूरोपीय देशों के व्यापारी भारत सहित पूर्व के देशों में व्यापार - व्यवसाय के लिए उस समय से आते - जाते रहे है,जब इतिहास का लिखा जाना भी शुरू नहीं हुआ था। वह समय आपसी शांति और सद्भाव का था, विशेषकर सौदागरों के लिए।हरेक देश के सौदागर दूर - दूर देशों में जाते,अपने देश का माल बेचते और वहां का खरीदते,चाहे वे आवागमन समुद्री मार्ग से करते हो या फिर सिल्क रुट के नाम से प्रसिद्ध थलमार्ग से, जो चीन से होकर मध्य एशिया होता हुआ यूरोपीय देशों तक जाता था।इस सिल्क रुट को अब फिर पुनर्जीवित कर चालू किया जा रहा है।
आठवीं सदी में अरब देश ईरान के कुछ व्यापारी श्रीलंका में रह रहे थे।उनमें एक अच्छा संपन्न और संभ्रांत व्यापारी था।अचानक एक दिन उसकी मौत हो गई।उसके करुकानो ने उसका व्यापार समेटा और उसकी दो नौजवान लड़कियों परिवार सहित अपने देश के लिए लौट पड़े।जब उनका जहाज सिंध प्रदेश के समुद्री क्षेत्र में पहुंचा तो कच्छा के कुछ समुद्री डाकुओं ने उन दोनों नौजवान लड़कियों को उड़ा लिया।यह बात जब खलीफा को पता चली तो उसने अपने दूत के माध्यम से राजा दाहिर से कहा कि वह उन लड़कियों की तलाश कराए और उन्हें वापस भेजे।खलीफा की मांग जायज थी,लेकिन राजा दाहिर कोई समुचित कार्यवाही कर प्रतिउत्तर ना दे सका। खलीफा को यह नागवार गुजरना ही था।उसने अपने सिपहसालार मुहम्मद बिन कासिम से राजा दाहिर को सबक सिखाने के लिए सिंध पर हमला करने के लिए कहा।यह बात सन 712 की है।
मुहम्मद बिन कासिम ने जब राजा दाहिर पर हमला बोला तो वह भी मैदान में आ डटा था।संयोगवश, हाथी पर लगे इस गोले से उसे पीछे हटना पड़ा,लेकिन वह दुश्मन के हाथो से बच नहीं पाया।उसने बहुत बहादुरी और दिलेरी दिखाई पर अंततः लड़ाई के मैदान में खेत रहा
राजा दाहिर के मरने के बाद मुहम्मद बिन कासिम ने उसके किले को घेर लिया।किला मजबूत था,जो दुश्मन से लोहा लेता रहा।राजा दाहिर की पत्नी भी दाहिर की भांति साहसी और बहादुर थी।वह बराबर अपने किले की रक्षा करती रही।लेकिन जब किले का दाना पानी चूकने लगा और बचने कि कोई उम्मीद नजर नहीं आई,तब रानी ने निर्णय लिया कि दुश्मन के आगे सिर झुकाने से बेहतर है कि लड़ते लड़ते मरा जाए।लिहाजा,उसने निर्देश दिया और उसके अनुसार तैयारियां की गई।किले की महिलाओं ने विधर्मी दुश्मन के हाथो अपनी इज्जत - आबरू गवाने की बजाय जौहर, यानी आत्मदाह का रास्ता चुना।किले में जगह - जगह चिताए जलाई गई,जिनमें महिलाओं ने हंसते - हंसते प्राणोत्सर्ग किया।पुरुष विधि - विधनपुर्वक अपने इष्ट देवी-देवता की पूजा-अर्चना करके,हाथो में नंगी तलवारें लिए किले से बाहर निकल पड़े - साका करने। मृत्यु तो निश्चित थी ही।वे बहादुरी से लड़े और दुश्मनों को काटते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
जौहर की प्रथा कैसे शुरू हुई? इस संबंध में इतिहास के पन्नों पर जो उल्लेख मिलता है,वह यही है कि विधर्मी शत्रुओ के हाथो अपवित्र होने से बचने के लिए महिलाओं ने अपने प्राणों को आहुति दी और पुरुष आत्मघाती दस्ता बनकर, रण क्षेत्र के लिए इस बात का दृढ़ निश्चय करते हुए रवाना हुवे कि अब शत्रुओं को मारते हुए ही मरना है।
हिंदु महिलाओं द्वारा जौहर करने की और पुरुषों द्वारा साका करने की,सिंध में घटी यह पहली घटना थी,जो आगे चलकर राजपूतों की जातीय विलक्षड़ता बन गई।बाद में इस तरह के जौहर की अनेक घटनाएं घटी है,जिनके जिक्र इतिहास में और जातीय स्मृतियों में यथावत दर्ज है।
इस पहले जौहर की घटना के साथ एक और विलक्षण घटना जुड़ी हुई है,जो एक राजपूत राजकुमारी की बुद्धि संपन्नता,चातुर्य और प्रतिशोध की अद्भुत शौर्य - गाथा कहती है।यह घटना भी दुश्मन के शिकंजे में फंसे होने के बावजूद जानते - बुझते आत्म - बलिदान से कम नहीं है।राजा दाहिर के किले पर कब्जा करते समय कासिम को राजा दाहिर की दो किशोर वय की राजकुमारिया हाथ लग गई। वे दोनों शायद, समय ना मिल पाने के कारण आत्मदाह ना कर पाई।कासिम ने उन दोनों को देखा तो देखता ही रह गया।एक तो अत्यंत सुंदर,दूसरे उच्च वंश की राजकुमारियां,उसे लगा कि अपने खलीफा को भेंट करने के लिए इन दोनों राजकुमारियों से बढ़कर और कोई दूसरी सौगात नहीं होगी।चलो,सौदागर की लड़कियां ना मिली तो ना सही,इन्हे ही ले चलते हैं।अतः उसने किले में मिले धन - दौलत के साथ दोनों राजकुमारियों को खलीफा की सेवा में भेज दिया।
कहा जाता है कि खलीफा ने जब उन राजकुमारियों को देखा तो वह भी उनकी सुंदरता पर मुग्ध हुए बिना नहीं रहा।खलीफा ने जब बड़ी राजकुमारी को पसंद कर अपनी अंकशायिनी बनाना चाहा तो राजकुमारी फूट - फूट कर रो पड़ी।खलीफा ने रोने का कारण पूछा।राजकुमारी ने बताया,' मै इस योग्य नहीं हूं की आप जैसे खलीफा का साथ पा सकू,क्युकी कासिम ने हमें पहले ही अपवित्र कर दिया है'
राजकुमारी की यह बात सुनकर खलीफा आगबबूला हो उठा।कासिम हालाकि, उसका सबसे वफादार और बहादुर सिपहसालार था,लेकिन उसकी यह हरकत खलीफा के बर्दास्त की सीमा से बाहर थी।उसने फौरन हुक्म दिया कि कासिम को जिंदा या मुर्दा उसके सामने जल्द से जल्द हाजिर किया जाए।
खलीफा के हुक्म का पालन हुआ और कासिम की लाश खलीफा के सामने हाजिर की गई।कासिम की लाश जब राजकुमारी को दिखाई गई तो राजकुमारी की आंखे खुशी से चमक उठी।उसने कहा," मैंने अपने मां - बाप के हत्यारे और अपने राज्य के दुश्मन से बदला ले लिया।कासिम बिल्कुल निर्दोष था,उसने हमें छुवा तक नहीं था, लेकिन मैंने उसके बारे में जो कहा,वह उससे बदला लेने के लिए था , और मैंने बदला ले लिया"
उल्लेखनीय यह है कि अरबों के इस पहले आक्रमण और इस घटना का कोई भी उल्लेख हमारे यहां नहीं मिलता।यह जानकारी तो हमे अरबों के इतिहास से मिली है। वटपी में हमें जो शिलालेख मिला है, उसमे यह तो दर्ज है कि सन् 756 में अरबों के हमले को विफल कर दिया गया , लेकिन इससे 44 वर्ष पूर्व हुए इस पहले आक्रमण का कोई भी हमारा इतिहास - स्त्रोत हमे जानकारी नहीं देता।लेकिन यह घटना घटी और अरब यह जमकर बैठ गए,इसका प्रमाण है कि एक कोरियाई बौद्ध भिक्षु हे चो का यात्रा - व्रत तंत्र । हे चो भारत का भ्रमण करते हुए सन 725 में इस क्षेत्र में पहुंचा।उसने लिखा : " वर्तमान में लगभग आधे देश में अरब वालो ने घुसपैठ की हुए है और लूटपाट तथा तबाही मचाई हुई है।"

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