जन्म आधारित जातिवाद आर्यों की मूल संस्कृति नही ।
#वर्णों_में_परिवर्तन न केवल संभव था, बल्कि यह व्यवहार में भी होता ही था। इसलिए मनु ने अंत में व्यवस्था दी कि ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं। यह पूर्णतया व्यक्ति के कर्मों और स्वभाव पर निर्भर करता था कि उसका वर्ण क्या रहेगा। मनुस्मृति में वर्ण की ही चर्चा है, जाति की नहीं। परंतु मनु में जन्मना जाति का निषेध अवश्य पाया जाता है। उदाहरण के लिए कहा गया है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए (मनु 3/109)। इसका सीधा तात्पर्य है कि जो जन्मना ब्राह्मण या ऊँची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं, उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, ब्राह्मण वर्ण पा चुकने के बाद उसे बनाए रखने के लिए भी ब्राह्मण को अतिशय परिश्रम करते रहना होता था। ब्राह्मणत्व अथवा द्विजत्व आज की भांति कोई पीएचडी की डिग्री नहीं थी कि एक बार प्राप्त कर ली तो उसके बाद चाहे पढ़ाई से कोई वास्ता न हो, परंतु आजीवन स्वयं को डाक्टर लिखा जा...